नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज में हाल ही में सामने आई तस्वीरों ने एक नई बहस को जन्म दिया है। प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मण यादव (@DrLaxman_Yadav) ने इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए दावा किया कि यह सरकारी कॉलेज अब किसी मंदिर से कम नहीं रहा।

डॉ. यादव ने ट्वीट किया “ये तस्वीरें किसी मंदिर की नहीं, सरकारी संस्थान दिल्ली विश्वविद्यालय के सरकारी पैसों से चलने वाले डिग्री कॉलेज दौलतराम कॉलेज की हैं. भाजपा और RSS ने धर्म और संस्कृति की आड़ में देश के सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों पर क़ब्ज़ा कर लिया है. वे अब किसी मंदिर से कम नहीं रहे. अफ़सोस ये है कि यहाँ के प्रोफ़ेसर और विद्यार्थी ये सब होता हुआ चुपचाप देख रहे हैं. क्योंकि बोलेंगे तो उन्हें धर्मद्रोही से लेकर देशद्रोही वामपंथी अर्बन नक्सल जैसा कुछ भी भी कहकर परेशान किया जाएगा. इसलिए सब चुप होकर ये सब में या तो शामिल हैं या ग़ायब हैं.”

https://twitter.com/DrLaxman_Yadav/status/1882388335055757619

सवालों के घेरे में शैक्षणिक स्वतंत्रता
डॉ. यादव के अनुसार, जो भी इन मुद्दों पर आवाज उठाता है, उसे “धर्मद्रोही”, “देशद्रोही” या “अर्बन नक्सल” जैसे लेबल देकर दबाने की कोशिश की जाती है। उनका मानना है कि यह चुप्पी न केवल संस्थानों की स्वतंत्रता को खतरे में डाल रही है, बल्कि छात्रों और शिक्षकों के विचारों की आजादी को भी सीमित कर रही है।

सोशल मीडिया पर बहस तेज
यह मुद्दा सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति का सम्मान मानते हुए सही ठहरा रहे हैं, जबकि अन्य इसे शैक्षणिक संस्थानों के भगवाकरण की प्रक्रिया का हिस्सा बता रहे हैं।

सरकार और प्रशासन से सवाल
इस पूरे मामले ने दौलतराम कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशासन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या कॉलेज के सरकारी फंड का इस्तेमाल धर्म विशेष को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है? और अगर हां, तो क्या यह भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के खिलाफ नहीं है?

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
शैक्षणिक विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य धर्म और राजनीति से परे रहकर स्वतंत्र सोच को बढ़ावा देना है। यदि शैक्षणिक संस्थानों का उपयोग धार्मिक और सांस्कृतिक प्रचार के लिए किया जाता है, तो यह भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिए एक खतरनाक संकेत हो सकता है।

By जन स्वराज न्यूज़ 24

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